बीजिंग/वाशिंगटन/मॉस्को: वैश्विक राजनीति की धुरी इस समय पूरी तरह चीन की तरफ घूम चुकी है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा के तुरंत बाद, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भी चीन पहुंचना इस बात का साफ संकेत है। दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली और परमाणु हथियारों से लैस नेताओं के बीच भले ही वैचारिक मतभेद हों, लेकिन आज दोनों को ही अपनी-अपनी मजबूरियों और रणनीतियों के कारण चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सख्त जरूरत है।
इस समय चल रहे वैश्विक संकटों के बीच, आइए समझते हैं कि ट्रंप और पुतिन के लिए चीन इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है:
1. व्लादिमीर पुतिन की मजबूरी: अर्थव्यवस्था और युद्ध के लिए 'लाइफलाइन' है चीन
यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों (अमेरिका व यूरोप) द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के बाद रूस पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुका है। ऐसे में चीन, रूस के लिए एक इकलौता और सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरा है।
रूसी तेल और गैस का सबसे बड़ा खरीदार: यूरोप द्वारा रूसी ऊर्जा पर प्रतिबंध लगाने के बाद, चीन रूस की 'पावर ऑफ साइबेरिया' जैसी पाइपलाइनों के जरिए भारी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीद रहा है। मिडिल ईस्ट (खासकर ईरान संकट) में जारी तनाव और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के ब्लॉक होने के कारण चीन भी सुरक्षित जमीनी रास्तों से रूसी ईंधन चाहता है।
आर्थिक और तकनीकी निर्भरता: प्रतिबंधों के कारण रूस में पश्चिमी तकनीक और सामानों की किल्लत है। आज रूस के बाजारों में चीनी कारें, माइक्रोचिप्स और इलेक्ट्रॉनिक्स भरे पड़े हैं। पुतिन के लिए अपनी गिरती अर्थव्यवस्था को संभालने और युद्ध का खर्च निकालने के लिए चीन के साथ व्यापार (जो $228 बिलियन को पार कर चुका है) जीवनदान जैसा है।
2. डोनाल्ड ट्रंप का समीकरण: अमेरिका की आर्थिक स्थिरता और व्यापारिक हित
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के तहत चलते हैं, लेकिन वे अच्छी तरह जानते हैं कि चीन से पूरी तरह नाता तोड़ना अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गर्त में धकेलना होगा।
सप्लाई चेन और महंगाई पर नियंत्रण: अमेरिकी बाजार और वहां की कंपनियां (जैसे एलन मस्क की टेस्ला या एप्पल) चीनी मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन पर बेहद निर्भर हैं। ट्रंप अगर चीन पर अत्यधिक टैरिफ लगाते हैं, तो अमेरिका में महंगाई बेकाबू हो सकती है, जो उनकी घरेलू राजनीति के लिए नुकसानदेह होगी।
भू-राजनीतिक संतुलन: ट्रंप प्रशासन इस समय ईरान और मिडिल ईस्ट के संकटों में उलझा हुआ है। ट्रंप चाहते हैं कि चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिकी तेल भी खरीदे और वैश्विक संघर्षों को रोकने के लिए अपनी कूटनीतिक ताकत का इस्तेमाल करे। चीन को पूरी तरह रूस के पाले में जाने से रोकना भी ट्रंप की एक बड़ी कूटनीतिक चाल है।
ब्लॉक बनाम संतुलन: शी जिनपिंग बने असली 'पावर प्लेयर'
बीजिंग में बैक-टू-बैक हुई इन मुलाकातों ने यह साबित कर दिया है कि आज वैश्विक राजनीति का केंद्र वाशिंगटन नहीं बल्कि बीजिंग बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है: "पुतिन जहां चीन के सामने एक 'जूनियर पार्टनर' या बेहद निर्भर सहयोगी के रूप में खड़े हैं, वहीं ट्रंप चीन को एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं जिससे पूरी तरह दुश्मनी भी नहीं की जा सकती और न ही जिसे नजरअंदाज किया जा सकता है। दोनों ही नेताओं का चीन के दरवाजे पर पहुंचना शी जिनपिंग को वैश्विक मंच पर सबसे मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा करता है।"
निष्कर्ष: पुतिन को जहां अपनी सत्ता और युद्ध को बचाए रखने के लिए चीन की आर्थिक और रणनीतिक मदद की जरूरत है, वहीं ट्रंप को अमेरिकी बाजार को स्थिर रखने और वैश्विक संकटों को संभालने के लिए चीन के सहयोग की दरकार है। यही कारण है कि आज की तारीख में ट्रंप और पुतिन, दोनों के ही रास्ते बीजिंग से होकर गुजरते हैं।
