राजनीतिक दलों के भीतर 'आम कार्यकर्ताओं' की भूमिका, उनके सम्मान और पार्टी की कार्यशैली को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर एक विचारोत्तेजक पोस्टर और संदेश तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें सीधे तौर पर बड़ी राजनीतिक पार्टियों की प्राथमिकताओं पर सवालिया निशान उठाए गए हैं।
क्या धनबल बन रही है पहली प्राथमिकता?
वायरल हो रहे संदेश और चर्चाओं का केंद्र यह सवाल है कि क्या आज की राजनीतिक पार्टियां सिर्फ धनबल और प्रभाव (रसूख) की राजनीति पर सिमट कर रह गई हैं? कार्यकर्ताओं और विश्लेषकों के बीच यह चर्चा आम हो चली है कि जब भी चुनाव या सत्ता का मौका आता है, तो सालों-साल पार्टी का झंडा उठाने और ज़मीन पर खून-पसीना बहाने वाले आम कार्यकर्ताओं को किनारे कर दिया जाता है, और पैसे व रसूख वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाती है।
ज़मीनी कार्यकर्ताओं का छलका दर्द
राजनीति के जानकारों का मानना है कि किसी भी दल की नींव उसके निष्ठावान और ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ता होते हैं। लेकिन जब बार-बार इननिष्ठ कार्यकर्ताओं की अनदेखी होती है, तो उनके भीतर हताशा और रोष पनपने लगता है। इस वैचारिक बहस का मुख्य बिंदु यही है कि जब तक ज़मीन पर संघर्ष करने वाले सच्चे कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक व्यवस्था में वास्तविक बदलाव लाना संभव नहीं है।
फिलहाल, यह मुद्दा राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि राजनीतिक दलों को आत्ममुग्धता छोड़कर अपने उन कार्यकर्ताओं के बारे में सोचना चाहिए जो बिना किसी स्वार्थ के पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाते हैं।
