पानीपत। 'सिटी ऑफ वीवर्स' अब 'सिटी ऑफ गारबेज' बनता जा रहा है। पानीपत की सड़कों पर फैला कचरा न केवल बदबू फैला रहा है, बल्कि बीमारियों को भी न्योता दे रहा है। आज हम तहकीकात करेंगे कि आखिर इस अव्यवस्था की जवाबदेही किसकी है।
व्यवस्था की तीन बड़ी नाकामियां
- निगम की कागजी सफाई: फाइलों में शहर चकाचक है, लेकिन जी.टी. रोड से लेकर गलियों तक कचरे के ढेर निगम के दावों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। सफाई कर्मचारियों की हाजिरी और ग्राउंड रियलिटी में जमीन-आसमान का अंतर है।
- वेस्ट मैनेजमेंट का 'जीरो' मॉडल: शहर में कूड़ा उठाने के लिए गाड़ियाँ तो खरीदी गईं, लेकिन कचरे के सही निस्तारण (Disposal) के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। डंपिंग पॉइंट्स अब डेंजर जोन बन चुके हैं।
- जनता का टैक्स, बदहाली का रिटर्न: शहरवासी सफाई टैक्स (Garbage Tax) तो भर रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें मिल रही है धूल, बदबू और मच्छरों की फौज।
कौन है असली दोषी? (दोषियों का पैनल)
- नगर निगम के अधिकारी: क्या ठेकेदारों पर कार्रवाई करने से अधिकारी डरते हैं? बार-बार शिकायत के बावजूद समाधान क्यों नहीं होता?
- लापरवाह ठेकेदार: क्या सफाई का ठेका लेने वाली कंपनियां सिर्फ बिल पास करवाने में जुटी हैं? मैनपावर की कमी का बहाना कब तक चलेगा?
- राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: स्थानीय नेताओं के वादे चुनाव तक ही सीमित क्यों रह जाते हैं?
"सफाई की गाड़ी हफ्ते में दो दिन आती है, बाकी दिन हमें खुद कचरा फेंकने की जगह ढूंढनी पड़ती है। बारिश में तो हालात नर्क जैसे हो जाते हैं।" — स्थानीय निवासी
पानीपत की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होगी। प्रशासन को डस्टबिन से लेकर डंपिंग यार्ड तक की पूरी चेन को दुरुस्त करना होगा। वरना, "स्वच्छ भारत अभियान" पानीपत में सिर्फ एक स्लोगन बनकर रह जाएगा। आपका क्या सोचना है? क्या पानीपत की सफाई व्यवस्था कभी सुधरेगी?