नई दिल्ली - आज के आधुनिक भारत में सुबह की चाय से लेकर रात के डिनर और कपड़ों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स तक, सब कुछ एक क्लिक पर घर आ जाता है। ई-कॉमर्स (Online Shopping) ने हमारी जिंदगी को बेहद आसान बना दिया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके मोबाइल स्क्रीन पर दिखने वाला 'Order Successful' का मैसेज देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना बड़ा संकेत है? आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, हमारी अनजानी और अंधाधुंध ऑनलाइन खरीदारी की वजह से देश की करेंसी (विदेशी मुद्रा भंडार) का एक बड़ा हिस्सा हर साल सरहद पार जा रहा है। आइए समझते हैं इस पूरे गणित को।
कैसे बाहर जा रहा है देश का पैसा?
जब एक आम उपभोक्ता किसी विदेशी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, ऐप या ब्रांड से ऑनलाइन शॉपिंग करता है, तो वह भुगतान तो भारतीय रुपये (₹) में करता है, लेकिन वह पैसा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूएस डॉलर ($) में बदलकर उन विदेशी कंपनियों के हेडक्वार्टर में पहुंच जाता है।
इसके दो मुख्य कारण हैं:
विदेशी ऐप्स और सेवाएं: कई बड़े शॉपिंग और गेमिंग ऐप्स का मालिकाना हक विदेशी कंपनियों के पास है। इनके जरिए होने वाली कमाई का मुनाफा सीधे बाहर जाता है।
इंपोर्टेड प्रोडक्ट्स (Country of Origin): ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बिकने वाले कई सस्ते और फैंसी सामान (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, खिलौने और कपड़े) चीन, वियतनाम या अन्य देशों में बने होते हैं। इनके आयात (Import) के लिए भारत सरकार को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा चुकानी पड़ती है।
अर्थव्यवस्था पर क्या हो रहा है असर?
बढ़ता ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा): अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब देश में बाहर से सामान ज्यादा आता है (Import) और यहाँ से बाहर कम जाता है (Export), तो 'ट्रेड डेफिसिट' बढ़ जाता है। यानी देश की कमाई कम और खर्च ज्यादा हो रहा है।
रुपये की सेहत पर असर: अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जब भुगतान के लिए डॉलर्स की मांग बढ़ती है, तो भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होने लगता है। रुपये के कमजोर होने से देश में पेट्रोल, डीजल और अन्य जरूरी विदेशी सामान और महंगे हो जाते हैं।
स्थानीय बाजारों में सन्नाटा: इस डिजिटल दौड़ का सबसे बड़ा नुकसान हमारे स्थानीय दुकानदारों, एमएसएमई (MSMEs) और घरेलू कारीगरों को हो रहा है। त्योहारों के सीजन में भी अब बाजारों की रौनक ऑनलाइन डिस्काउंट की भेंट चढ़ती जा रही है।
क्या है इसका समाधान? 'लोकल' ही बनेगा 'ग्लोबल'
विशेषज्ञों का मानना है कि ऑनलाइन शॉपिंग को पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है और न ही यह व्यावहारिक है। लेकिन उपभोक्ता अपनी आदतों में थोड़ा बदलाव करके देश की बड़ी मदद कर सकते हैं:
'Country of Origin' जरूर देखें: ऑनलाइन सामान खरीदते वक्त ऐप पर यह जरूर चेक करें कि सामान बना कहाँ है। 'मेड इन इंडिया' (Made in India) उत्पादों को प्राथमिकता दें।
स्वदेशी प्लेटफॉर्म्स का सपोर्ट: भारतीय ई-कॉमर्स कंपनियों और उन ऐप्स का इस्तेमाल करें जो सीधे भारत के छोटे व्यापारियों और बुनकरों से सामान खरीदकर बेचते हैं।
'वोकल फॉर लोकल': जो सामान आपके घर के पास की मार्केट में आसानी से उपलब्ध है, उसे वहीं से खरीदें। इससे आपके शहर और देश का पैसा देश के ही भीतर घूमता रहेगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
निष्कर्ष: आपकी जेब से निकला एक-एक रुपया देश की आर्थिक रीढ़ को मजबूत या कमजोर कर सकता है। अगली बार जब आप 'Add to Cart' पर क्लिक करें, तो यह जरूर सोचें कि आपका यह पैसा देश के किसी कोने में खुशहाली ला रहा है या देश से बाहर जा रहा है।
